October 28, 2026

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देश के आदिवासियों को “वनवासी” कहे जाने का विरोध, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने उठाया सवाल

*दल्ली राजहरा: छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा/छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ ने देश के आदिवासी समुदायों को “वनवासी” कहे जाने का विरोध करते हुए कहा है कि यह केवल शब्दों का विवाद नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की ऐतिहासिक पहचान, संस्कृति और अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।मोर्चा का कहना है कि “आदिवासी” शब्द उन समुदायों की पहचान को दर्शाता है जो सदियों से इस देश के मूल निवासी रहे हैं और जिन्होंने अपनी विशिष्ट भाषा, संस्कृति, परंपराओं तथा प्राकृतिक संसाधनों के साथ गहरा संबंध बनाए रखा है। आदिवासियों की पहचान और उनके ऐतिहासिक अस्तित्व तथा सामाजिक योगदान को संकुचित करता है।छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के प्रदेश के अध्यक्ष पूर्व विधायक श्री जनक लाल ठाकुर ने कहा कि आदिवासी समाज ने देश की आज़ादी, जल-जंगल-जमीन की रक्षा तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और आदिवासी प्रकृति को अपना पुरखा मनाते है, मूल रूप से इन्होने ही प्राकृतिक का संरक्षण किया है । इसलिए उनकी पहचान का निर्धारण उनकी सहमति और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक या वैचारिक दृष्टिकोण से। बीजेपी सरकार वर्तमान में जिस तरह बहुमत या अपने शक्ति के आधार पर कुछ भी कर रही है लगता है ये कल इतिहास भी बदल देंगे इसका कोई भरोसा नहीं है, आज देश के आदिवासियों को वनवासी कह रहे है कल पता नहीं कौन से समुदाय को क्या कह दे, देश में जब तक ये सरकार मुफ्त का लॉलीपॉप दे रहे तब तक ये कुछ भी करने और कहने की शक्ति रखते है। देश की डबल इंजन की सरकार देश की जनता को मांगने वाली बना रही है और अपने राजनीतिक हित के लिए कुछ भी नीति अपना रही है।छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के अध्यक्ष सोमनाथ उइके ने यह भी कहा कि संविधान और विभिन्न सरकारी दस्तावेजों में आदिवासी समुदायों को अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता प्राप्त है। ऐसे में उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का सम्मान किया जाना चाहिए। किसी भी समुदाय पर उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई पहचान थोपना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।माइंस श्रमिक संघ के महामंत्री रामचरण नेताम ने यह भी कहा कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व होने के बावजूद आदिवासी पहचान से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षित स्पष्टता और संवेदनशीलता दिखाई नहीं दे रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपनी पहचान, इतिहास और अधिकारों को लेकर लगातार सजग है तथा किसी भी प्रकार के वैचारिक या सांस्कृतिक हस्तक्षेप का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेगा।उपाध्यक्ष सुरेन्द्र साहू ने आदिवासी समाज की अस्मिता, अधिकारों और सम्मान की रक्षा करते हुए कहा कि देश की विविधता और लोकतंत्र तभी मजबूत होंगे जब प्रत्येक समुदाय की ऐतिहासिक पहचान और आत्मसम्मान का सम्मान किया जाएगा। छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा/छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ के पदाधिकारी राजाराम धनकर, नासिक यादव, ललन साहू, नम्मू यादव,ने आदिवासियों को वनवासी कहे जाने का विरोध किया है,देश के सभी आदिवासियों से इसके लिए माफी और आदिवासियों के लिए वनवासी शब्द को वापस लेने की मांग किया है।हाई लाइट ठाकुर जी **आदिवासी प्रकृति को अपना पुरखा मानते है।****आदिवासी प्रकृति का मूल संरक्षक है*सोमनाथ उईके **आदिवासियों को वनवासी कहना बर्दाश्त नहीं*

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