निलेश श्रीवास्तव
जिला ब्यूरो चीफ
महिला आरक्षण देश की महिलाओं के अधिकार और उनकी राजनीतिक भागीदारी से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय है, लेकिन केंद्र की मोदी सरकार ने इसे भी राजनीतिक लाभ का औजार बना दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार महिला आरक्षण की बात करते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि एक सुनियोजित नैरेटिव के जरिए असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है।
हमारी स्पष्ट मांग है कि 2023 में सर्वसम्मति से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम और संविधान में जोड़ा गया अनुच्छेद 334(A) ईमानदारी से और बिना किसी अनावश्यक शर्त के तत्काल लागू किया जाए। लेकिन मोदी सरकार इसे परिसीमन और जनगणना से जोड़कर जानबूझकर उलझा रही है।
यह भी स्पष्ट है कि यह पूरी प्रक्रिया जातिगत जनगणना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को लगातार टालने की एक रणनीति है। एक तरफ भाजपा चुनाव प्रचार में महिला आरक्षण का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ कानून को संविधान में शामिल हुए तीन साल बीत चुके हैं—फिर भी इसे लागू करने की कोई ठोस नीयत नजर नहीं आती।
चुनाव के बीच विशेष सत्र बुलाना भी साफ तौर पर चुनावी लाभ लेने की कोशिश है। यदि सरकार की नीयत साफ होती, तो चुनाव के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाकर मानसून सत्र में इस पर गंभीर चर्चा की जाती इससे कोई आसमान नहीं टूटता।
परिसीमन कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम होंगे लोकसभा सीटों का संतुलन बदलेगा, राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व प्रभावित होगा और सामाजिक न्याय पर गहरा असर पड़ेगा। ऐसे गंभीर विषय पर जल्दबाज़ी करना लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है।
इतिहास गवाह है कि 1993 में पंचायत और नगरीय निकायों में महिला आरक्षण बिना किसी परिसीमन के लागू किया गया था। उस ऐतिहासिक फैसले ने लाखों महिलाओं को राजनीति में लाकर सशक्त किया। तब कोई बहाना नहीं बनाया गया, लेकिन आज की सरकार बहानों के पीछे छिप रही है।
कांग्रेस पार्टी का स्पष्ट मत है—
● 29 अप्रैल के बाद सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए।
● सरकार अपने सभी औपचारिक प्रस्ताव राजनीतिक दलों के साथ साझा करे।
● यह प्रक्रिया विधानसभा चुनावों के बाद ही आगे बढ़ाई जाए।
महिला आरक्षण कोई चुनावी जुमला नहीं है, यह देश की आधी आबादी के अधिकार का सवाल है। इसे राजनीतिक हथियार बनाना बंद करना होगा।
अनिला भेडिया
विधायक डौडी लोहारा

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