कोरबा, छत्तीसगढ़ ( CG LIVE NEWS 24 ) : ऊर्जाधानी कोरबा में सीएसईबी की पुरानी आवासीय कॉलोनियों को खाली कराने और निर्माण कार्यों के नाम पर जो वृक्ष कटाई चल रही है, उसने अब एक संगठित और बड़े लकड़ी तस्करी गिरोह का पर्दाफाश कर दिया है। रामपुर स्थित जूनियर क्लब के पास राजस्व भूमि से महज सात पेड़ों की चोरी से शुरू हुई यह जांच अब 9 लाख रुपये से अधिक मूल्य की बेशकीमती इमारती लकड़ी और भारी-भरकम क्रेन की बरामदगी तक जा पहुंची है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने जिले के प्रशासनिक अमले, वन विभाग और सीएसईबी के जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या सैकड़ों किलोमीटर दूर तक राष्ट्रीय संपदा की इस अवैध तस्करी का यह खेल केवल एक ठेकेदार के भरोसे चल रहा था, या फिर टेबल के नीचे से प्रशासनिक संरक्षण का खेल खेला जा रहा था?
पूरा मामला तब उजागर हुआ जब सिविल लाइन थाने में वन विभाग की ओर से सात पेड़ों की कटाई और लकड़ी चोरी की प्रारंभिक रिपोर्ट दर्ज कराई गई। रामपुर क्षेत्र में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) की बाकायदा अनुमति से 207 पेड़ों को काटने का ठेका दिया गया था। 29 जून 2026 को काटे गए पेड़ों में से सात वृक्षों के लट्ठों को 14 जुलाई की शाम एक वाहन में लोड किया जा रहा था। कार्यपालन अभियंता द्वारा सूचना दिए जाने के बावजूद, जब तक अधिकारी मौके पर पहुंचे, वाहन गायब हो चुका था। आरोपी ठेकेदार सुनील कुमार गुप्ता ने शुरुआती पूछताछ में लकड़ी अभनपुर भेजने की बात कबूल की, जिसके बाद पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ तिवारी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक लखन पटले और नगर पुलिस अधीक्षक प्रतीक चतुर्वेदी के मार्गदर्शन में प्रशिक्षु डीएसपी आस्था शर्मा की विशेष टीम ने आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

हालांकि, यह गिरफ्तारी इस विशालकाय घोटाले की महज एक ऊपरी परत साबित हुई। जब राज्य स्तरीय जांच दल ने तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर कोरबा से 250 किलोमीटर दूर रायपुर-अभनपुर क्षेत्र में दबिश दी, तो वहां से लगभग 20.169 घनमीटर इमारती लकड़ी और एक क्रेन बरामद की गई। प्रारंभिक एफआईआर में जिस लकड़ी की कीमत महज 2 लाख रुपये बताई गई थी, जांच आगे बढ़ते ही वह 9 लाख रुपये के पार निकल गई। इस चौंकाने वाले अंतर ने यह साफ कर दिया है कि रामपुर ही नहीं, बल्कि सीएसईबी की अन्य कॉलोनियों से भी बड़े पैमाने पर बिना किसी वैध दस्तावेज के साल, सरई और अन्य कीमती लकड़ियों को बाहर खपाया जा रहा था।
अब यह मामला केवल एक चोरी का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर अधिकारियों की संदेहास्पद भूमिका और विभागीय घोर लापरवाही से जुड़ गया है। जनता और स्थानीय सूत्रों के बीच यह चर्चा बेहद आम है कि इतनी भारी-भरकम इमारती लकड़ी को क्रेन के जरिए लोड करके, कई जिलों के पुलिस चेकिंग पॉइंट और वन विभाग के नाकों को पार करते हुए 250 किलोमीटर दूर पहुंचा देना बिना उच्च स्तरीय शह के संभव ही नहीं है। क्या संबंधित क्षेत्र के वन परिक्षेत्र अधिकारी, राजस्व अमले और सीएसईबी के निगरानी अधिकारियों को अपनी नाक के नीचे हो रहे इतने बड़े परिवहन की भनक तक नहीं लगी? या फिर एफआईआर दर्ज कराकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली गई ताकि मुख्य सरगनाओं और मददगार अधिकारियों पर आंच न आए?

मामले की गंभीरता को देखते हुए अब कोरबा पश्चिम और अन्य आवासीय परिसरों में चल रही वृक्ष कटाई पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि पुराने आवासों को तोड़ने के नाम पर काटी जा रही कीमती लकड़ियों को कौड़ियों के भाव, महज 5 रुपये प्रति किलो की दर से बंदरबांट किया गया है। यदि पारदर्शी तरीके से भौतिक सत्यापन कराया जाए तो करोड़ों रुपये के लकड़ी घोटाले का सच सामने आ सकता है।इस समय पूरा जिला प्रशासन और पुलिस महकमा कटघरे में खड़ा है। यदि उच्च अधिकारी केवल निचले स्तर के ठेकेदार को बलि का बकरा बनाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश करेंगे, तो यह कानून-व्यवस्था पर बड़ा धब्बा होगा। आम जनता और पर्यावरण प्रेमियों की मांग है कि रामपुर से लेकर कोरबा पश्चिम तक काटी गई हर एक लकड़ी का सार्वजनिक ऑडिट कराया जाए, तस्करों के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) खंगाले जाएं और इस सिंडिकेट में शामिल हर छोटे-बड़े अधिकारी पर आपराधिक षड्यंत्र की धाराओं के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि सरकारी संपदा की इस खुली लूट पर हमेशा के लिए लगाम लग सके।















